07/03/09

चर्चा..दहेज

नमस्कार, बहुत से पाठको ने पहेली बन्द ना करने की बात कही,तो मै फ़िर से यह पहेली बूझना चलाऊगा, लेकिन थोडा कम करुगां, क्योकि पहेली पुछना पहेली बताने से ज्यादा कठीन है, तो चलिये अगली पहेली मे कुछ दिनो बाद पुछुगां.





लेकिन मेने एक नया कार्य कर्म बनाया है *चर्चा* नाम से जिस मै हम अलग अलग बातो पर चर्चा किया करेगे, ओर आप सब अपनी अपनी राय उस विषय पर दे सकते है, आप सभी के विचार बहुत ही कीमती होगे, लेकिन जब भी जिस विष्य पर चर्चा हो तो आप के विचार सिर्फ़ उस चर्चा पर ही हो किसी खास व्याक्ति को निशाना बना कर या दुसरे का नाम ले कर ना हो, मेरे लिये आप सभी सम्मान जनक है, ओर सभी के विचार हिन्दी मे हो तो ज्यादा उचित होगा.
न्यवाद
आज की चर्चा है दहेज, जिस से हम सब बहुत दुखी है, बहुत से केस रोजाना अदालतो मे आते है, बहुत सी शादिया टुटती है, यानि इस दहेज से सभी को दुख है ओर वो भी सिर्फ़ देते समय, लेते समय सभी इन सब बातो को भुल जाते है, दहेज आज कल से नही बहुत ही पुरानी रीति है जिसे हमारे बुजुर्गो ने सदियो पहले बनाया था, ओर इतनी पुरानी रीति जो सदियो से चली आ रही है, उस मै एक दम से कुरितिया केसे आ गई?
यह रीति जिसे बुजुर्गो ने बनाया बिलकुल सही बनाई थी,लडकी की शादी के समय, लडकी को उस का हिस्सा ( बाप की ज्यादाद ) दहेज के रुप मे दे दिया जाता था, उस के बाद जब भी लडकी मायके मै आती तो माता पिता उस के बाद भाई उसे अपनी ओकात के हिसाब से उपहार देते, दिन त्योहार पर भी उसे उपहार भेजते थे, इस का मतलब यह था कि लडकी को याद दिलाते थे, कि हम अब भी तेरे अपने है, इस घर से अब भी तेरा नाता है, सुख दुख मै हम तेरे साथ है, ओर भाई बहिनो मे खुब प्यार होता था. ओर कोई भी लालच नही होता था,
दहेज मै लडकी का बाप अपनी हेसियत से अपनी मरजी से देता था, ओर लडके वाले भी जो मिलता था उसे सर आंखो पर रखते थे, ज्यादा की मांग कोई नही करता था, मांग होती थी तो लडकी के गुणो की, जिस ने घर को आ कर समभंलना है, बचपन से ही लडकी को सभी बाते समझाई जाती थी, ओर आज भी जिस लडकी मे शालीनता है सहन शाक्ति है, बोलने का ढंग है, बातो मै एक बेटी, एक मां का प्यार झलकता है वोही अपने घर को स्वर्ग बना पाती है, ओर असली दहेज यह गुण होते थे,


शादी के बाद हिन्दू धर्म के अनुसार( क्न्या दान) के बाद लडकी का घर उस का ससुराल होता है, ओर अपने मायके मै आना जाना तो होता है, लेकिन बहुत प्यार से, ओर भाई भी उस के बच्चे सभी इन्तजार करते थे, ओर मिलने के बहाने के लिये अलग अलग त्योहार बनाये गए थे, जेसे राखी, भाईया दुझ, ओर लडकी शादी के बाद मायके के किसी भी काम मे दखल नही देती थी, ओर ना ही भाईयो को कोर्ट कचहरी तक ले जाती थी, कोर्ट कचहरी जाना एक अपमानित माना जाता था, किसी के घर भी कभी पुलिस नही आती थी, तालाक तो शायद लाखो मे एक होता था.



मै भी ओर आप सभी भी दहेज का विरोध तो सभी करते है, ओर इसी दहेज के कारण कितने ही झुठे सच्चे केस आज कल लडकी ओर लडकी वाले बनाते है, तलाको की संख्या शायद युरोप से भी बढ कर हो गई है, लेकिन जो लडकी जब ससुराल आती है तो उस समय तो वो अपने ससुराल वालो का जीना हराम कर देती है, चलो अगर लड झगड कर वो घर मे किसी तरह से बस गई तो कुछ सालो बाद अपने मां बाप का, अपने भाईयो का जीना हराम कर देती है, उन की ज्यादाद मे से हिस्सा मांग कर, फ़िर भाईयो से ओर मां बाप से दुशमनी, यह सब मेने एक घर मै नही बहुत से घरो मे देखा है, ओर इस ब्लांग जगत मै भी नारियां बहुत गर्व से यह कहती नही अखराती की मां वाप की ज्यादाद मे हमे हिस्सा चाहिये,



अगर हिस्सा ही मांगना है तो उस से अच्छा तो पहले ही दहेज ले कर चुप हो जाओ, अब अपने पिता के छोटे से व्यापार को बेटा या बेटे मिल कर खुब बडा कर ले, एक मकान की जगह खुबसुरत बंगला खरीद ले, ओर बडो का मान रखने के लिये सब कुछ मां बाप के नाम से हो ओर एक दिन प्यारी बहन कोर्ट कचहरी की धमकी दे हिस्सा लेने के लिये, तो प्यार कहा गया, कहा गया मान, कहा गये भाई बहिन, क्या यह सब उचित है?



कानुन तो कानुन हे, लेकिन कनुन के दिल नही , भावनाये नही, रिशते नाते नही, आज गुण पेसा है, प्यार पेसा है, भाई बहिन सब पेसा है? तो आओ हम इस दहेज के साथ ही अपना हक भी ना मांगे, जिस से हमारे रिश्तो मे एक मिठास बनी रहे, आओ दुरिया घटाये, दुरिया बढाने से कोई लाभ नही.

आप सब की राय का इन्तजार रहेगा, अच्छी , बुरी, सहमत असहमत जेसी भी हो आप अपनी राय जरुर दे, यह मेरे अपने विचार है, कोई पक्की मोहर नही, शायद मै गलत भी हो सकता हुं.
अगर आप के पास भी कोई चर्चा लायक बात हो तो आप भी इस मे हिस्सा ले सकते है, गर कोई गलती हो तो क्षमा करे,

15 comments:

  1. dehej pratha band ho jani chahiye,hum sehmat nahi ke pehlehi ladki apna hissa lele jab shaadi ho aur baad mein kuchnahi mange,ladki ka bhi pita ke jayadad pe hak hai,jab bhi pita batwara kare,use uska hak milna chahiye tab.vaise hum es aat ke bhi hai ke agar ladki ka sasural bahut dhani aur sampan hai to phir wo maike se kuch nahi le to behtar.

    kisne banaya ye riwaz ke ladki ko ghar chodna chahiye,kyun ladke apna ghar chodke ,ladki ke ghar rehne nahi aa jateshaadi ke baad.?

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  2. आप दहेज़ की निंदा ना करके उसको बढ़ावा दे रहे हैं क्युकी आप कह रहे हैं की दहेज़ लो और हिस्से की बात मत करो . ये एक रुढिवादी सोच से ऊपर कुछ नहीं हैं .


    आप लेख और चर्चा की आड़ मे पुनः लड़कियों को विरासत से महरूम करने की बात कर रहे हैं . अगर बात कुछ ना लेने की हो तो क्यूँ ना ऐसा कानून बने की जो भी जायदाद हैं वो जिसकी कमाई की हैं उसके बाद स्टेट को चली जाए ना पुत्र ना पुर्त्री किसी का भी अधिकार ना हो उस पर .
    देश मे कानून हैं और उस कानून का पालन करना होगा . ये सब रेफोर्म्स भुत जदोजहद के बाद बने हैं उनको नकार कर आप क्या साबित करेगे .

    कन्यादान करके माँ पिता लड़की को एक वास्तु का दर्जा देदेते हैं और दामाद को भिखारी का . कन्यादान को बंद करना चाहिये ताकि बेटे और बेटी मे समानता आये . आपके विचार निहायत दकियानूसी हैं और आप चाशनी मे घोलकर औरतो के अधिकार की नहीं उनको दोयम बनाए की बात कर रहे हैं .

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  3. दहेज़ प्रथा क्यों बनाई गयी थी इसके बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं थी... काफी अच्छा लगा यह जानकार...
    और मैंने ब्लॉग जगत में अभी तक कोई ऐसा पोस्ट नहीं पढ़ा है जिसमें लड़की ने अपने हिस्से ki मांग की हो, तो मैं कोई टिपण्णी नहीं करना चाहूँगा... वैसे मुझे लगता है की लोग थोड़े बहुत पढ़े लिखे हो गए हैं और ऐसी बातें अशिक्षित ही कर सकते हैं..

    पहली टिपण्णी में कहा गया है कि क्यों केवल लड़की ही अपना घर छोड़े ?? इसपर यही कहना चाहूँगा कि अगर हर बात पर हम यही सोचें कि ऐसा क्यों ?? तो कुछ भी संभव नहीं हो सकता है.. फिर तो मैं भी पूछुंगा..पृथ्वी क्यों ?? poorab क्यों ?? रात क्यों ??
    कुछ नियम बनाए गए हैं जिन्हें बदलना संभव नहीं है... तो उस पर बेकार कि बहस क्या सही है ??

    हाँ, यह मानता हूँ की अभी भी पुरुष और औरतों में समानता नहीं आई है... अभी भी औरत को बंधक ही माना जाता है.. पर दूसरी तरफ ये भी तो सोचें कि हम कितने बदल गए हैं.. आज से दस साल पहले जो होता था कम से कम अब तो नहीं हो रहा है... हम अब शिक्षितों कि तरह बात और काम कर रहे हैं जो कि तारीफ़ के लायक है और आशा करता हूँ की अभी और सुधार होगा और अगर हम भी उसमें सहायक बने तो बहुत ही ख़ुशी कि बात होगी...

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  4. रचना जी आप हमेशा लडने की बात करती है, अपनी बात सहज ढंग से भी तो कह सकती है, वेसे इस दहेज प्रथा के बिलकुल विरोध मै हुं, ना इस बिमारी को लेता हुं, ओर ना ही देत हुं, लेकिन इस बाद जो हक की बात है... वो भी उचित नही , यानि हक का मतलब कान को सीधा ना पकड कर घुमा कर पकडना.
    रचना जी, क्न्या दान मेरे लिये तो एक पवित्र काम है , बेटी कोई वस्तु नही होती, घर की इज्जत होती है, जिसे बाप हर ऎरे गेरे को नही दे देता, उसे खान दान के लोगो के सामने किसी इज्जत दार परिवार को दिया जाता है, जिसे कन्या दान का नाम दिया जाता है, किसी भी रस्म को एक नाम दिया जाता है, अगर आप को कन्या दान अच्छा नही लगता तो कोई अच्छा सा नाम सुलझाऎ?
    लेकिन बात इस ढंग से करे कि सब को अच्छी लगे , आप का स्वागत है

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  5. दहेज़ एक अभिशाप है इसे मिटाना होगा ये हम सभी चाहें तो दहेज न लेकर और न देकर रोक सकते हैं

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  6. अच्छी बात कहने का मतलब ये नहीं होता की हम कानून का उपहास करे . खरी बात कहती हूँ , विवाद करके मुद्दे पर मे किस तरह कहती हूँ इस पर नहीं . लड़की को परम्परा के चलते दान करना एक दकियानूस सोच से ऊपर कुछ नहीं हैं . और जो लोग ये करते हैं वो केवल और केवल अपने मोक्ष प्राप्ति के लिये करते हैं . दान की हुई वास्तु पर अपना कोई अधिकार नहीं होता हैं फिर आप तो बेटी को दान करते हैं ताकि आप को मोक्ष मिले , महिलाओं नए बहुत लड़ाईयां लदी हैं इस सोच से ऊपर आने के लिये की लड़की परायाधन होती हैं . और लड़की को संविधान और कानून मे बराबरी का हिस्सा मिलता हैं

    ब्लोगिंग के माध्यम से कुंधित सोच को आप फेलाते और एक जागरूक नागरिक होते हुआ मे इस लिये आँख बंद कर लूँ क्युकी इस से मेरी छवि एक लड़ने वाली बन जायेगी तो मुझे कोई फरक नहीं पड़ता . फरक पड़ता हैं सिर्फ इस बात से की गलत बातो को बधवा ना दिया जाए समानता की बात हो जो कानून से स्वीकृत हैं

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  7. कुछ नियम बनाए गए हैं जिन्हें बदलना संभव नहीं है... तो उस पर बेकार कि बहस क्या सही है ??


    saarey niyam aurto kae liyae hi kyu banae gaye haen ?? aur kisnae banaaye haen

    aur agar ek galat niyam badal jaataa haen to kyaa kayaamt a jaayegi

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  8. रचना जी मोक्ष की इच्छा वो करते होगे जो इस जन्म मै दुखी होगे, मै तो कभी मंदिर भी नही जाता, तो मुझे इस चीज से कोई मतलब नही , मरने के बाद मेरा क्या होता है, मुझे इस से कोई मतलब नही, लेकिन... आप ने बताया नही कन्या दान की जगह इस पबित्र रस्म को क्या नाम दे??या आप इसे पबित्र ही नही मानती, बेटी कोई घर का समान नही जिसे कोई यु ही कोई ले जाये. बेटी की तरफ़ ऊठने वाली आंख निकाल ली जाती है.
    धन्यवाद

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  9. भाटिया जी, आपने मुद्दा तो बहुत अच्छा उठाया है,किन्तु लगता है कि आपने इस मुद्दे के जरिए मधुमखियों के छत्ते में हाथ दे दिया है.

    @रचना जी, नारी और पुरूष के केवल शारीरिक संरंचना ही नही अपितु सोचने, समझने, चित्त वृत्ति, मनोभाव में भी प्रकृ्ति ने कुछ अन्तर निर्धारित किया है. अगर आप थोडी सी भी धर्म के बारे में जानकारी रखती है तो आप जानती ही होंगी की समाज में पुरूष और नारी के भिन्न भिन्न धर्म बतलाये गए है . क्यों कन्या को पराया धन कहते है?, कन्यादान को क्यों श्रेष्ठ दान माना गया है?, कन्या के जन्म के और कर्म के माता पिता कौन कहलाते है?.कल को आप चाहो तो प्रकृति पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दो की क्यों हर नस्ल में मादा को ही जन्म देने की तकलीफ उठानी पड़ती है.पुरूष क्यों नहीं बच्चा जनते ?
    ऐसा ही क्यों है या ऐसा क्यों नही है? इस पर चाहो जितनी बहस कर लो नतीजा कभी कुछ नही निकलने वाला . चूँकि समाज को सुव्यस्थित रूप से चलाने के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए तो शायद ये सब नियम उसी व्यवस्था का ही एक हिस्सा है . हो सकता है की सब बातें पूर्ण रूप से सही नही हो लेकिन सब बातें पूर्ण रूप से ग़लत भी नही होंगी . कोई आमुचुल परिवर्तन शायद इसकी बुनियादे हिला दे इसीलिए समय के साथ साथ इनमे धीरे धीरे परिवर्तन होता रहता है और इसे स्वीकार कर के जीने को ही सामाजिक जीवन कहते है .

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  10. मैं दहेज का विरोध करती हूँ। लेना और देना दोनो ही गलत हैं। माता पिता की सम्पत्ति पर सभी संतानों का बराबर का हिस्सा होना चाहिए, यदि वे देना चाहें तो। और यह तब मिलना चाहिए जब माता पिता की मृत्यु हो जाए तब उनकी वसीयत के अनुसार। यदि माता पिता अपनी पुत्रियों को अपने धन सम्पदा से वंचित रखना चाहते हैं तो उनकी किसी भी वस्तु, प्यार में भी अधिकार ही कैसा ? कुछ मूल्य या भावनाएँ या तो होती हैं या नहीं। यदि नहीं हैं तो पुत्रियाँ यह स्नेह पैदा नहीं करवा सकतीं। पुश्तैनी जायदाद में तो बराबर का हिस्सा है ही।
    जहाँ तक दहेज के रूप में पुत्री को उसका हिस्सा देने की बात आती है तो क्या इसमें उसको दिए कपड़े, गहने व ससुराल वालों को दिए उपहार भी सम्मिलित माने जाएँगे? किसी पुत्र को जायदाद के रूप में कुछ धोती ता पतलून, शेरवानी,बर्तन,फ्रिज आदि दे के देखिए। शायद वह माता पिता के मुँह पर मारेगा या भला हुआ तो 'नहीं चाहिए धन्यवाद कह देगा।'
    पुराने जमाने में दहेज का कोई तर्क रहा हो, आज नहीं है। यदि माता पिता के पास देने लायक सम्पदा है तो बराबर बाँटनी चाहिए। यदि नहीं है तो पुत्र पुत्रियों को वृद्धावस्था में उनकी समान रूप से सहायता करनी चाहिए। जहाँ जायदाद का बंटवारा हो रहा हो वहाँ माता पिता के प्रति कर्त्तव्यों का भी सहज रूप से, माता पिता की सुविधानुसार बंटवारा होना चाहिए। अधिकारों के साथ कर्त्तव्य भी होते हैं।
    कन्यादान स्त्री को अपमानित करने वाली प्रथा है। इसको क्या कहा जाए ? कुछ भी नहीं। विवाह को केवल विवाह कहना चाहिए। कन्यादान बस बंद हो जाना चाहिए, कम से कम उनके द्वारा तो जो सजग हैं। फिर भी जो कन्याएँ दान होना चाहती हैं और कोई उन्हें दान में लेना चाहता है तो उनका स्वागत है। वे अपने विचारों के लिए उतने ही स्वतंत्र हैं जितनी मैं अपने विचारों के लिए। और मैं उनके अपने विचारों को कहने, प्रस्तुत करने के अधिकार के प्रति भी उतनी ही सजग रहना चाहूँगी जितना अपने उन विचारों के विरोध के अधिकार के प्रति। विचारों का मतभेद रखने का अधिकार ही असली लोकतंत्र की पहचान है।
    घुघूती बासूती

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  11. विवाह के अवसर पर नए जोडे यानि वर वधू को माता पिता की ओर से उपहार दिए जाने की प्रथा थी ... यह उपहार सिर्फ वधू के माता पिता की ओर से ही नहीं वर के माता पिता की ओर से भी दिए जाते थे ... अभी हाल हाल तक वर और वधू दोनो के परिवार वाले समान हैसियत के हुआ करते थे ... इसलिए उपहार का मूल्‍य नहीं , भावनाएं ही देखी जाती थी ... जब से निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवार के भी अच्‍छे पढे लिखे वर के पद और प्रतिष्‍ठा को देखते हुए उच्‍च मध्‍यमवर्गीय परिवार वाले अपनी कन्‍या का विवाह उनसे करने को लालायित हो रहे हैं ,यह दहेज दानव अपने पैर अधिक पसारने लगा है ... और उन्‍हीं की देखादेखी में निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवार भी अपने बच्चियों के लिए दहेज देने को बाध्‍य हैं।

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  12. दहेज के हम भी विरोधी हैं।

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  13. घुघूती बासूती, कन्या दान का मतलब यह तो नही की पिता ने उस बेटी को दान मे दे दिया, यह तो बस एक रस्म को नाम दिया गया है, वेसे दान लेना भी कोन चाहेगा, संगीता जी आप ने बहुत ही सुंदर ढंग से सारी बात समझाई है, अनिल जी मैने खुद बिना दहेज ..... ओर मेरे बच्चो ने अगर भारत मे शादी की तो वो भी बिना दहेज ही होगी, वत्स जी आप ने बहुत ही सुंदर बात कही.

    रचना जी ,हर समाज के अपने अपने नियम है बनाया किस ने ? बहस की बात नही... लेकिन जिन्होने भी इसे बनाया वो कोई एक अकेला नही था, सभी नियम समय के साथ साथ खुद बदल जाते है, जो गलत होते है, उन्हे बदलने के लिये मै, या आप अकेले कुछ नही कर सकते, ओर पुरा समाज उन्ही नियमो को मान्यता देता है जो सही होगे, जो हम सब की भलाई के लिये होगे, ओर यह समाज कोई एक व्यक्ति नही जो मेरी ओर आप की तरह से हुकम चला दे, यह समाज हम सब से बना है, ओर यह सब सदियो से ऎसा होता आ रहा है, नारी की इज्जत सब से ज्यादा भारत मे है,अब इस का सबुत... अमेरिका युरोप मे, अरब देशो मे देख कर पता चलता है, ओर जिस दिन आप की सोच के हिसाब से दुनिया चली तो लगता है क्यामत आ ही जाये गी.
    महक जी, इस भारत मे आप को बहुत से लडके मिलेगे जो शादी के बाद ससुराल मे रहने ते है, जरुर आप के आसपास भी कोई ऎसा होगा, लेकिन उन का हाल आप खुद देख ले, वेसे लडकी खुद नही चाहती की शादी के बाद वो अपने पति समेत मायके मै रहे, ओर अगर ऎसा होता है तो सब से पहले लडकी ही अपने पति की इज्जत नही करती ,
    प्रतीक महेशबरी जी आप के विचार भी बहुत ही सुंदर है, ओर यह समाज अकेले मर्द से नही बना, ओर ना ही अकेली ओरत से बना, दोनो आधे आधे हिस्से दार है, ओर दोनो एक दुसरे के बिना अधुरे भी है,आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद

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  14. दहेज़ किसी भी रूप में निंदनीय है. जहां तक लडकी के माता-पिता द्वारा अपनी इच्छा से उपहार देने की बाद है तो वह भी वस्तुओं के रूप में होनी चाहिए रुपयों में नहीं . और अगर वो धन ही देना चाहते हैं तो बेहतर हो यदि यह धन लडकी के बैंक अकाउंट में डाला जाये जिससे बुरे वक्त में वो उसका उपयोग कर सके. रही बात माता-पिता की जायदाद में लडकी के हिस्से की बात तो मुझे लगता है. की कानों होने के बाद भी, भारतीय महिलाओं को इतना बोल्ड और प्रोफेशनल होने में अभी वक्त लगेगा कि वो अपने पिता-भाइयों से हिस्से की मांग खुल कर कर सकें. हाँ, पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित्त एलिट क्लास के लोगों की बात और है. दहेज़ की समस्या के के समाधान लिए खासकर युवाओं को आगे आना होगा.

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  15. bahut hi achchee charcha ka manch shuru kiya hai.

    dahej pratha ke to main bhi khilaaf hun.
    aap ke vicahr jaankar prasnnta hui.

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नमस्कार, आप सब का स्वागत है। एक सूचना आप सब के लिये जिस पोस्ट पर आप टिपण्णी दे रहे हैं, अगर यह पोस्ट चार दिन से ज्यादा पुरानी है तो मॉडरेशन चालू हे, और इसे जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा। नयी पोस्ट पर कोई मॉडरेशन नही है। आप का धन्यवाद, टिपण्णी देने के लिये****हुरा हुरा.... आज कल माडरेशन नही हे******

मुझे शिकायत है !!!

मुझे शिकायत है !!!
उन्होंने ईश्वर से डरना छोड़ दिया है , जो भ्रूण हत्या के दोषी हैं। जिन्हें कन्या नहीं चाहिए, उन्हें बहू भी मत दीजिये।