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5/3/10

कुछ ऎसी यादे जो बरबस ही मुस्कुराहटे ला देती है....


अजी बात कुछ पुरानी है, पिछले साल की जब हम मां से मिलने आखरी बार गये थे, घर से बच्चे हमे उडान से दो घंटे पहले एयर पोर्ट छोड आये, टिकट वगेरा तो मेने पहले ही घर से ऒ के कर ली थी, बोर्डिंग कार्ड बगेरा भी घर से ही ले लिया, बस समान दिया तो जल्द ही चेकिंग हो गई ओर हम अंदर पहुच गये, मेरे पास उस समय लेपटाप था, सुना था कि एयर पोर्ट पर इंटर्नेट सेवा फ़्रि है, लेकिन जब मैने जा कर इंटरनेट चलाना चाहा तो तो वो एक घंटे के ५ € मांग रह था, मेने अपना लेपटाप बन्द किया.

फ़िर टेक्स फ़्रि शाप पर गया.... बाप रे सब कुछ बाहर से यहां महंगा था, कुछ नही खरीदा, फ़िर वापिस बाहर आ गया, फ़िर एक मित्र को फ़ोन लगाया, तो राम राम के बाद उन्होने पुछा कि केसे फ़ोन लगाया, तो मेने कहा कि टाईम पास करने के लिये, ओर उन से फ़ोन पर करीब ४५ मिन्ट बात की, बात खत्म तो मुझे पेशाब आ गया, तो मेने अपना लेपटाप एक कुर्सी पर रखा उस पर अपन कोट रखा ओर मै शोचालय की ओर चल पडा, वहा काम निपटा कर वापिस आने लगा तो इधर उधर घुमता हुआ काफ़ी देर बाद वापिस आया.... तो देखा.... जिस जगह मेने लेपटाप रखा है वहां से सभी लोग दुर चले गये थे, ओर वो पुरी लाईन ही नही पुरा हाल ही खाली पडा था, उस सुन सान को देख कर मै समझा कि मेरी उडान निकल गई, लेकिन सिर्फ़ १० मिन्ट मे यह केसे हो सकता है? ओर मै अपनी मस्ती मै चलता हुआ अपनी जगह पर बेठ गया, तभी चार पुलिस वालो ने मुझे चारो ओर से घेर लिया, ओर पुछा यह समान आप का है? मैने कहा हां मेरा ही है, तो उन्होने कहा आंईदा ऎसे छोड कर मत जाये, आप की वजह से बहुत बडी गडबड होने से बच गई, ओर साथ ही उन्होने वायलेस से कोई सुचना दी दुसरी तरफ़ से आवाज आई हे भगवान तेरा ध्न्यवाद(जर्मन मै) ओर फ़िर सभी लोग धीरे धीरे वापिस मेरे आस पास बेठ गये, ओर मै सारा मामला समझ गया था,

फ़िर जब जहाज मै बेठे तो मेरे संग एक भारतिया बेठे थे, मुझे बहुत अच्छा लगा, उन के पहरावे से मुझे वो मुस्लिम लगे ओर वो थे भी मुस्लिम, जब हमारा जहाज अपनी ऊचाई पर पहुच गया तो खाने पीने की घोषणा हुयी ओर कुछ समय बाद खाना भी आ गया, मै शाका हारी हुं, लेकिन बीयर पी लेता हुं, लेकिन पास बेठे सज्जन के कारण मेने सिर्फ़ पानी ही पिया, ओर उन्होने कोला... फ़िर थोडी देर बाद एयर होस्टेज ने पुछा कि आप क्या पीयेगे( सभी से पूछ रही थी) अब मेरे दिल मै तो बीयर पीने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन साथ बेठे भाई का ख्याल कर के मै चुप रहा, तो एयर होस्टेज ने उन से पूछा कि आप क्या लेगे... तो उन्होने एक डबल पेंग मंगवाया, बाप रे अब मेरे सब्र का बांध टुट गया ओर मेने माफ़ी मांग कर एयर होस्टेस से कहा कि अगर आप के पास यह वाली बीयर है तो मुझे एक बीयर ओर एक पेग दे दो( असल मै मैने बीयर देख ली थी) ओर मेरीआवाज सुन कर वो एयर होस्टॆज चहक ऊठी ओर बोली तुम श्री मान भाटिया हो ना? ओर मैने कहा तुम भी तो सविना हो जो हमारे डा० के यहां नोकरी करती थी, ओर फ़िर हम दोनो बहुत प्यार से मिले उस ने मुझे अपनी दोनो बाहों मै भर लिया, ओर बताया कि उस की जिन्दगी की यह पहली उडान है एयर होस्टल के रुप मे, ओर फ़िर दिल्ली तक मेरी खुब सेवा हुयी, ओर उस ने सभी से मुझे मिलवाया, ओर अपना अगला प्रोग्राम भी बताया, कहां मै बीयर पी कर सोने की सोच रहा था, ओर कहां सारी रात, सारे रास्ते उस से गप्पे मार कर निकली ओर पता भी नही चला कि कब दिल्ली पहुच गया.
घर आ कर मैने अपने घर मै सब को सारी बाते बताई, ओर जब अगली बार हम अपने डा० से मिलने गये तो वहां पता चला कि उस ने भी सब को बताया, ब्लांग मै मैने उस समय यह सब बाते इस लिये नही लिखी की मन बहुत उदास था

हां मुझे उस एयर होस्टेज ने पूछा कि जब आप मुझे पहचान गये थे तो पहले बुलाया क्यओ नही, तो मैने कहा कि जिन्दगी मै कई बार हमे एक ही सक्ल से मिलते जुलते लोग मिल जाते है, अगर तुम वो नही होती तो सोचती कि यह मेरे ऊपर लाईन मार रहा है, ओर मै यह नही चाहता था, बस इस लिये.

11/11/09

वो कोन था??

मै भुत प्रेत को नही मानता, लेकिन कभी कभी हमारे साथ कुछ ऎसा घट जाता है कि हमे समझ नही आता कि यह भर्म है या कुछ ओर.... लेकिन यह है क्या??आज जी.के. अवधिया जी के ब्लांग पर एक लेख पढा तो मुझे यह घटना याद आ गई, पहले सोचा कि इस घटना को टिपण्णी के रुप मे दे दुं... लेकिन जब टिपण्णी बहुत बडी हो गई तो इसे यहां लेख का रुप दे दिया... आप बताईये यह भर्म था, या कोई आद्र्श शाक्ति ??

मेरे पिता जी दिल्ली सर्विस करते थे, हम लोग रोहतक मै रहते थे, रोहतक बहुत से लोग रोजाना दिल्ली आते जाते है, पिता जी ७,३० तक घर आ जाते थे, कभी कभार ही ९ बजते थे, ओर हमारे घर के बिलकुल सामने पार्क था, हम सब पार्क मे खेलते थे, एक दिन पापा १० बजे तक घर नही आये, ओर सब लोग अपने अपने घर चलेगे, मै मां के पास बेठ गया ओर उस रास्ते को देखने लगा जिस से पापा आते थे, करीब १०,३० बजे पापा दुर से आते दिखाई दिये, फ़िर साईकल से हमारे पास से गुजर कर घर के सामने अपनी साईकिल पार्क की ओर अंदर घर मै चलेगे,

तब तक मै ओर मां भी घर मे आ गये, उस समय हमरे पास एक ही कमरा किरये का था, तो मां पिता जी को समबोधित कर के बोली, लेकिन कोई जबाब नही आया तो मां ने उस तरफ़ देखा जहा पापा रोजाना बेठते थे, मै भी बाहर बेठा था, तो मां ने मुझे आवाज दी कि बेटा यह चाय अपने पापा को दे दो, मेने कहा मां पापा तो अंदर ही है, फ़िर हम ने देखा पापा कही भी नही थे, ओर साईकिल भी नही, मां ने मुझे पुछा तुम ने पापा को देखा था ना, मेने हां कहा, फ़िर मां ने कहा हा मेने भी देखा था... फ़िर हम ने पुछ ताछ शुरु की, करीब १२ बजे हमे खबर मिली की उस ट्रेन का बहुत बुरी तरह से एकसीडॆंट हो गया, ओर करीब ८० लोग मर गये है, ओर हजारो घायल हो गये है, फ़िर हम सब को बहुत फ़िकर हुयी अब केसे जाये उस जगह पर, सभी लोग इकट्ठे हो गये.....

उस साईकिल वाले को दो लोगो ने ओर भी देखा था, करीब १,३० बजे पिता जी अपनी साईकिल से आ गये, ओर उन्होने बताया कि पहले मै इसी ट्रेन मै बेठा था, लेकिन मुझे किसी ने आवाज मारी, मुझे लगा कि मेरा बेटा मुझे बुला रहा है, मै उसे देखने नीचे उतरा तो ट्रेन चल पडी थी, इस कारण मै दुसरी ट्रेन से आया हुं पहली ट्रेन का एक्सीडेंट होने के कारण हमारी टएन को भी रुकना पडा.... अब हम मां बेटा को जो दिखा वो कोन था? ओर मेरे पिता जी को जिस ने आवाज मार कर ट्रेन से उतारा वो कोन था?

6/23/09

कुछ हमारी ओर कुछ तुम्हारी बाते, /नोटिस बोर्ड मुफ़त मै

हम सब के जीवन मै कुछ अजीब गरीब बाते होती होगी, लेकिन हम उन्हे नजर अंदाज कर देते है, कई लोग वहम कर के तंत्रिक या बाबा जी के पास जा कर पेसा खराब करते है, लेकिन जो होता है, जो घटता है वो हमे नुक्सान तो नही पहुचाता, बस घट जाता है,ओर उस का कोई उपाय भी नही, हम कर भी नही सकते कूछ, इस लिये जो होता है उसे होने दो, ओर बेफ़िक्र रहो..
जेसे..
मै जब भी कभी किसी भी काम से घर से बाहर गया, काली बिल्ली जरुर रास्ता काट कर जाती है, चाहे भारत हो या जर्मनी.
मोसम बहुत अच्छा है,धुप निकली है... ओर मै मोसम देख कर एक साबुत तरबुज ले आया,फ़्रिज मै रखा दुसरे दिन खाने के लिये.... लेकिन अगले दिन से ही झडी लग जाती है, कई दिनो तक, ओर जब थक कर सर्दी मै ही तरबुज काट लिया दुसरे दिन मोसम फ़िर से साफ़.
पुरा सप्ताह किसी का भी फ़ोन नही आया, फ़ोन ऊठा कर देखा कही खराब तो नही हो गया, कभी दिल बना तो कोई अच्छी फ़िल्म का विचार बना ओर जब सब बेठ कर देखने लगे... अभी पहला सीन ही शुरु हुया कि फ़ोन बज उठा, आधा घंटा बात की, फ़िर फ़िलम शुरु फ़िर फ़ोन, फ़िर फ़िलम शुरु फ़िर फ़ोन...थक कर फ़िलम बन्द कर दो, फ़ोन अपने आप बन्द...
कोई भी पार्टी हो, जिसे मेने वोट दिया वो हमेशा हार गई...
दो सप्ताह कि छुट्टियां मजे से गुजरी , सोम बार को ओफ़िस जाना है शनि बार को तबीयत खराब ....
जब भी कोई वस्तु बहुत सम्भाल कर रखो, मोके पर कभी नही मिलती
ओर भी बहुत सी ऎसी बाते है, जो मुझे याद नही, अगर आप लोगो के संग भी कुछ ऎसा होता हो तो जरुर लिखे
नोटिस बोर्ड सुचना

चलिये अब बात करते है अगली पहेली की,सोम वार को, पिछले समय अनुसार ही यह पहेली भी प्राकाशित होगी,(रात २.०० बजे,/ भारतिया समय ५,३० अगर आप लोग समय मै परिवर्तन चाहते है तो अपनी राय जरुर देवे, बहुमत से ही फ़िर समय का निर्यण होगा) आप जरा फ़िर से किलो, मस्जिदो, मंदिरो, ओर दिवारो,शिवालो को ध्यान से सोच ले, पहेली कठिन बिलकुल नही, प्राकश गोविंद जी आप की राय अच्छी है, लेकिन हमे क्या पता कोन कब आया ओर कब नही, बस कोई जेसे जेसे आता रहा , ओर जबाब देता रहा, चलिये अगली पहेली का जबाब देखे कोन कोन देते है, धन्यवाद

3/10/09

अरे बाबा आज तो ग्यारह मार्च है !!

Paon_chhu_lene_do_...


नमस्ते, नमस्कार सत श्री अकाल.
शादी शुदा लोगो से( मर्दॊ से) अगर जिन्दगी भर खुश रहना चाहते है तो, मेरी तरह से रोजाना सुबह सब से पहले नीचे लिखी आरती किया करे, यह आरती स्पेशल हमारे लिये लिखी गई है, ओर जिस दिन से यह आरती हम ने करनी शुरु की तब से मस्ती से ब्लांगिग करते है, वीयर पीते है,कोई फ़िकर नही... बस यह सब इस आरती के कारण, अगर आप भी घर मे शांति चाहते है, आजादी चाहते है तो इस आरती को आज ही एक बडे से कागज पर प्रिंट कर ले, ओर मेरी तरह रोज सुबह भजे, थोडे दिनो मे मुंह जबानी याद हो जाये गी, फ़िर मोजा ही मोजा...... यह रचना इन महाशय जी की है इलिस जी


आज का शुभ दिन इस आरती से करे......
ज़य हो ज़य हो, ओ पत्नी रानी,
करती हो तुम अपनी मन मानी
बात हमारी हरदम हो टालती,
हम उतारें तेरी..... आरती

तुम समान बलशाली
कोई जग मैं नही दूजा
हम तो हैं बल्हीन,
तुम्हारी करें किस तरह पूजा
हम से खाना बनवाने वाली,
बर्तन मंज्वाने वाली
नौकर सा हम को धिध्कारती,
ओ रानी, हम उतारें तेरी...... आरती

तुम बच्चो की अम्मा प्यारी,
सास की हो बिटिया प्यारी

कभी अगर तुम रूठो,
कर दो खटिया खडी हुमारी,
हम को अक्सर हाड्काने वाली,
आँखें दिखाने वाली......

गुस्सा तुम हम पर उतारती,
ओ रानी, हम उतारें तेरी आरती,


धूप दीप कुछ तुम्हे ना सोहे
गर कपूर बाति,
क्रीम पाउडर वाली,
लखी लखी तुम काफ़ी हर्षाति,
यूँ तो लगती हो भोली भाली,
लेकिन तुम हो एक दू-नाली,

बोली की गोली हरदम मारती हो,
ओ रानी, हम उतारें तेरी आरती,

पति-पत्नी के इस जग में
है वही पुराना नाता,
बैठी बैठी खाती पत्नी,
पति दिन-रात कमाता,
निश दिन मौज उडाने वाली,
हुमको तरसाने वाली,
सारी कमाई तुम डकारती हो,
ओ रानी, हम उतारें तेरी आरती,


ये सारी धन-दौलत तेरी,
तेरा चाँदी सोना,
हम तो केवल इतना चाहे,
तू नाराज़ ना होना,
हम को उल्लू बनाने वाली,
घर की हे लक्ष्मी आली,
सेवक को काहे फटकारती,
ओ रानी, हम उतारें तेरी आरती

ओ रानी, हम उतारें तेरी आरती !!!

अन्त मै एक शिक्षा हमारी तरफ़ से, अगर बीबी को खुश रखना हो, ओर घर मे शान्ति रखनी हो, तो आप बीबी की सास की पुरी इज्जत करे, वो आप की मां की पुरी इज्जत करे गी







Chand Si Mehbuba H...



आज के दिन 1988 मे हमारी शादी बडी धुम धाम से , सरकारी सडक को रोक कर, ओर यार दोस्तो ने नाच नाच कर, हमारी खुन पसीने की कमाई को दारू मे लुटा कर, ओर हमे एक घोडी पर बिठा कर अपना उलट सीधा खुब नाच दिखाया, दिल तो हमारा भी कर रहा था नाचने को, लेकिन घोडी को कोन सम्भालता ? हम यही से समझ गये कि घोडी पर शादी से पहले इसी लिये बिठाया जाता है कि अभी से समभालाना सीख लो.

ओर फ़िर बहुत सारी रस्मे निभाकर हम अपनी धर्म पत्नी को अपने दिल की डोली मे बिठा कर घर ले आये, ओर बाकी बीबी तो बिलकुल वेसी है जेसी सब की होती है, शुरु शुरु मे थोडी खटपट हुयी, जेसे स्टेशन पर नये यात्रियो के चढने से होती है, फ़िर गाडी चली नही तो सब दोस्त बन जाते है, फ़िर भाईया हम भी पक्के दोस्त बन गये, ओर फ़िर हमने दो सुंदर सुंदर से बेटे अपने दोस्त को तोहफ़े मे दिये, बाकी हमारी जिन्दगी की ट्रेन आज तक चल रही है, जेसे आप सब की चल रही है....

हमारी बीबी दिल्ली से है, इन का नाम है कंचन भाटिया, ओर मेरा नाम राज कुमार भाटिया ,शादी से पहले हमारा वजन सिर्फ़ ५० किलो था, यानि बहुत पतले ओर अब ८०,९० के बीच रहता है, बस हम खुश है इस लिये चाहते है आप सब भी बहुत खुश रहे, लेकिन हमे बहुत सी मुश्किले भी आई, कई बार ऎसे वक्त आये कि फ़ेसला करना कठीन था, लेकिन हम दोनो ने मिल कर हर मुश्किल का सामना किया, हर फ़ेसला हम दोनो का होता है, अब बच्चे भी हमारे हर फ़ेसले मै शमिल है.

यानि शादी के बाद मै, मै नही रहा हम हो गये, एक दुसरे का सहारा बने, हर मुश्किल मे साथ रहे,एक दुसरे के आंसू पोंछे, एक दुसरे की कमी को मजाक नही बनाया, बल्कि प्यार से उसे दुर किया, एक दुसरे के परिवार को अपने से अलग नही समझा, दोनो ने एक दुसरे के मां बाप को अपने मां बाप के समान इज्जत प्यार दिया, एक दुसरे से कुछ नही छुपाया.

ओर आज के दिन हम किसी भी होटल मे खाना खाने नही जाते, बस घर पर ही आम दिनो की तरह से रहते है, वेसे ही जेसे हर रोज चलता है, क्योकि हमारा तो रोज का दिन ही एक दुसरे के लिये होता है,
116 SANGAM = MEIN ...
बस इस बार आप लोगो को अपने परिवार से मिलवाने का एक बहाना था.
आप सभी का धन्यवाद आप आये मेरे परिवार से मिले बच्चो से पहले ही मिल चुके है, आप सभी का धन्यवाद, नमस्ते, चलिये फ़िर मिलते है.......

अरे क्या कहां फ़ोटू, अरे हां हम अपनी दोनो की फ़ोटू दिखाना तो भुल ही गये, तो यह लिजिये ...., हम लोग बिलकुल साधारण है, बिलकुल आम लोगो की तरह से,कोई मेकअप नही, कोई दिखावा नही , जेसे है वेसे ही आप सब से मिलेगे ,

9/13/08

ओये बजाजे

कुछ पुरानी डायरी के पन्नो से ...........
बात काफ़ी पुरानी हे, जब मेरी शादी भी नही हुयी थी, मे शादी के सिल सिले मे भारत आया हुआ था, ओर अभी दो दिन थे शादी को, ओर दोस्त लोग रोजाना घेरे रहते थे,आज इस के तो कल उस के ओर सभी चाहते थे कि शाम उन के घर गुजरे, थोडा पीने पिलाने का दोर चल जाता था, मे बहुत ही कम पीता लेकिन फ़िर भी मजा आता था,दोपहर कही, तो सुबह का नास्ता कही, मां भी कुछ ना कहती, ओर दिन ऎसे ही गुजरते गये, फ़िर हमारे हाथ भी पीले हो गये, ओर कब एक महीना गुजर गया पता ही नही चला, सब दोस्तो के घर चार चार बार खा आये लेकिन किसी को घर मे एक चाय का कप भी नही पिलाया, बस जो बारात मे गये वही सब ने खाया सो खाया या फ़िर घर मे जो पार्टी हुयी उस मे , फ़िर एक दिन सब को घर पर बुलाया सब बच्चो वाले थे मेरे सिवा, ओर उस दिन सारा दिन हम सब ने खुब मजे लिये, ओर मेरे घर पर भी सब को मजा आया.

इन दोस्तो मे एक दोस्त था बजाज, जो पहले सब से ज्यादा चहकता था, स्कुल मे कालेज मे,हर लडकी पर अपना हक जताना, फ़िर उस से बात करना हम सब का हीरो, ओर हम सब उसे गुरु मानते थे, क्योकि लडकी को देख कर हमे सर्दियो मे भी पसीना आ जाता था, ओर जुबान बन्द हो जाती, उस से पुछते केसे पुटाये लडकी, लेकिन गुरु कि शिक्षा लडकी के सामने जा कर फ़ुस हो जाती, ओर गुरु हमे खुब गालिया देता, अब मेरे इस एक महीने के दोर मे इस बजाज को छोड कर सब दोस्तो ने बार बार बुलाया, ओर आज बजाज भी हमारे घर पर अपनी बीबी ओर बच्चो के संग आया था.

मेरी बीबी की सभी सहेलिया बन गई, ओर सभी नारियां अलग ओर हम सब अलग बाते कर रहे थे, साथ मे थोडी बहुत शराब भी चल रही थी, सब ने ध्यान दिया की आज बजाज कुछ चुप सा हे, ओर पी भी नही रहा,नही तो पहले बीयर की बोतल उस से खोसनी पडती थी, सब ने पुछा बजाजे सब ठीक तो हे, तबियत ठीक हे, तो बोला हां, तो दुसरा बोला यार तु तो रोनक हुआ करता था आज तेरी बोलती केसे बन्द हो गई कही भाभी ज्यादा ताकतवर तो नही इस पर सभी हंस पडे, तो निश्चित हुआ कल शाम बजाजे के घर (हम सब उसे बजाजे कहते थे). तो बजाज बोला ठीक हे, लेकिन मेने पीनी छोड दी, ओये क्यो एक ने पुछा तो बजाज बोला मेने नाम ले लिया हे राधा स्बामी का ( यहां किसी को बुरा लगे तो मे पहले से ही माफ़ी मांग लेता हू, मेरा मकसद किसी को बदनाम करना नही बस अपनी ओर दोस्तो की बात कर रहा हू,)तो सब ने कहा ठीक हे तुम मत पीना लेकिन हमारे लिये ला कर रखना.बजाज ने अनमने मन से हां कर दी.

दुसरे दिन सभी दोस्तो की टोली उस के घर पहुचं गये, ओर बजाजे ने एक बोतल छुपा कर दे दी ओर बोला ऊपर जा कर बेठॊ ओर मेरी बीबी को पता ना चले इस बोतल का, उस के मां बाप नीचे रहते थे, ओर वह ऊपर, हम सब ऊपर चले गये, ओर जेसा की अपने घरो मे होता हे उसने सब को गिलास दिये, एक पानी का मग ओर एक छोटी सी मेज बीच मे रख दी,साथ ही बोला बोतल नीचे रखना,सभी दोस्तो ने एक पेग डाला ओर बजाजे ने एक गिलास मे कोला डाली, चियर्स के बाद वह कभी पकोडे लेने जाये तो कभी सब्जी, तो कभी मटरी , सभी दोस्त अभी एक पेग भी नही पी पाये थे, कि उस दोराना बजाज चार पांच चक्कर लगा आया किचन के, फ़िर दुसरा पेग डाला, बजाज ने बची हुई कोला डाली..फ़िर से बो नमकीन लेने गया ओर जब वापिस आया तो हमे लगा कि वह कुछ झुम रहा हे, ओर हम मे से किसी ने इस को वहम समझा.

थोडी देर के बाद बजाज फ़िर कुछ करने अन्दर गया, इस बार फ़िर मे लगा कि यह झुम रहा हे, फ़िर भी हम ने सोचा यह तो नाम dhaarii हे, शायद हमे ही चढ गई हे,तो सब ने कहा बजाजे आज यार नशा जल्दी होगा लगता हे यार खाना डलवा, बजाज फ़िर अन्दर गया, थोडी देर बाद गिरता गिरता ओर गुण गुणाता अ बोला खाने मे थोडी देर ओर हे, तो दोस्तो ने पुछा हम पी रहे हे गिर तु रहा हे,यह कया माजरा हे, तो अब बजाज थोडा अपने पुराने वाले रंग मे आया ओर बोला होता हे, सालेयो तुम्हे चढ गई हे. हम चुप हमारे दोस्तो मे एक बनवारी लाल जी भी थे, जो देखने मे बिलकुल भोले भाले लेकिन इस बजाज के बाप थे,इस बार जब बजाज वहाने से उठा ओर अन्दर गया तो बनवारी लाल जी भी दबे पावं पीछे हो लिये , ओर झट से एक अग्रेजी शराब की बोतल ओर उस बजाज को पकड कर ले आये.

हम सब हेरान,फ़िर बजाज ने हाथ जोड कर हम सब से माफ़ी मागीं ओर कहां यार मे भी पीता हू, लेकिन जब से नाम लिया हे, तब से चोरी पीता हू.
ओर वह शाम हमारी सब की सब से अच्छी शाम बीती हमारा यार बजाज फ़िर पहले रंग मे आ गया था, ओर सारी रात ठहक्के पर ठहक्के गुजे, बीच मे किसी ने उसे कहा भाई तेरा नाम तो बजाज बोला आज नाम की छुट्टी, लेकिन सभी ने पी बहुत ही कम लेकिन नशा बातो का बहुत हुआ, ओर वो शाम हमारी सब की शान दार शाम बनी, पहले तो सब भागने कि कर रहे थे, ओर फ़िर सब का मन जाने को नही कर रहा था.
धन्यवाद, लेकिन अब सभी दोस्त बिछुड गये ....... बस यादे बच गई हे

8/5/08

बोतल

आज समीर भाई जी की पोस्ट पढते पढ्ते इक लाईन पढी**वो जो बोतल कनाडा से लाये हो, वो तो रखी होगी न कि साफ हो गई.** ओर यह लाईन पढ कर मुझे कुछ याद आ गया सोचा आप सब से बांट लु, लेकिन इस से पहले मे यह बता दु मे चालाक नही हु, बुद्धु भी नही, बिलकुल साधारण सा आम आदमी...मे जब भी भारत मे आता था,तो पिता जी के लिये Scotch Whisky जरुर लाता था, पिता जी पीते तो बहुत कम थे, लेकिन उन्हे भी इन्तजार रहता था, ओर उन्हे किसी भी चीज से लगाव नही था, मे हमेशा दो बोतल लाता एक पिता जी को दे देता था,दुसरी अपने पास रखता था, अगर बच गई तो पुरी पिता जी को दे देता था, मे भी बहुत कम पीता हू,
अब चलते हे असली कहानी की ओर, एक बार मे जब भारत आया तो हमेशा की तरह से एक बोतल पिता जी को दे दी, दुसरे दिन मेरा साडू(मेरी साली का पति) परिवार समेत मिलने आया साथ मे मेरा छोटा साला भी था दुसरी बोतल उन दोनो ने टिकाने लगा दी, मेरे लिये कोई बात नही थी, ओर मे पीता भी नही था,तीसरे दिन मेरा भाई आया ओर बोला भाजी जो हमारा किराये दार हे ना उसने मेरे बहुत से काम किये हे, ओर मेने उस से वादा किया था जब भी मेरा भाई आयेगा तुम्हे जी भर के scotch whisky पिलाउगा, लेकिन अब क्या करे,तो मेने कहा भाई फ़िर क्या हुआ, भाई बोला पिता जी के पास हे आप मांग लाओ,क्यो कि आज शाम को मेने उसे कह दिया हे.मेने कहा शाम को उसे बुला लो बाकी शाम को.
शाम को भाई ने मुझे कहा मे उसे यही ८ बजे ले आउगा, मेने कहा जब चाहो ले आओ, ठीक आठ बजे भाई ओर किराये दार, मेरे कमरे मे आ गये, ओर वो जनाब एक किलो मछ्ली के पकोडे भी साथ मे लाये, मेने उन्हे बिठाया, थोडी बहुत बात की, शायद मुझे नही जानते थे,इस लिये शर्मा रहे थे,तो मेने सीधे ही पुछ लिया आप कोला लेगे, पानी या फ़िर सोडा, तो शरमाते हुये बोले कुछ भी मेने कहा अजी जो भी कहो मिलेगा, तो उन्होने कोले की पसंद बताई, मेने एक नयी बोतल Whisky कि निकाली ओर कहा, लिजिये आप ही इसे खोले, तो बह सज्जन बहुत खुश हुये ओर बोले नही आप बडे हे आप ही खोले.
मेने जोर लगा के थोडी आवाज से बोतल खोली उन सज्जन को एक पेग डाला, चियर्स किया, मेने दोनो से कहा मे बहुत कम पीता हू तुम अपने हिसाब से पीना मेरी इन्तजार मत करना, किराये दार ने पहला पेग बहुत जल्द खतम किया फ़िर दुसरा पेग लिया, अरे यह क्या वो तो पुरा शारबी हो गया, उस से पेग उठाना मुस्किल था,लेकिन उस्ने दुसरा पेग पी लिया
ओर भाई से बोला मुझे मेरे घर छोड आओ, उसे छोड कर भाई ने पुछा आप यह बोतल कहा से ले आये, तो मे हंस पडा
ओर उसे कहा तुम ने अभी पी नही इस लिये पुछ रहे हो.लेकिन भाई को कुछ समझ मे नही आया तो मेने उसे पुरी बात बताई कि.
जब दोपहर को तुम मुझ से बात करके चले गये तो मेने किसी से xxx Rum मगवाई ओर उसे इस Scotch की खाली बोतल मे डाल दिया, ओर डक्कन जोर से बन्द कर दिया, जब तुम लोगो ने कहा तो मेने जान कर डक्कन खोलने के समय थोडा जोर लगाया ओर डक्कन को रगड कर खोल जिस से थोडी आवाज आई, ओर तुम्हारे मेहमान को मेने जब पुछा की कभी स्काच पी हे तो उस ने मना कर दिया, मतलब उसे पहले ही लगता था स्काच पता नही क्या हे ओर वो उस के नाम से ही ओर खुशी से ही शारबी हो गया, ओर दो पेग भी नही पी सका.ओर हम सब हंस हंस कर लोट पोट हो गये.
दुसरे दिन से वह सज्जन हमारी बहुत तारीफ़ करते फ़िरते थे अपने दोस्तो मे,ओर आज भी मुझे जब यह बात याद आती हे तो...

मुझे शिकायत है !!!

मुझे शिकायत है !!!
उन्होंने ईश्वर से डरना छोड़ दिया है , जो भ्रूण हत्या के दोषी हैं। जिन्हें कन्या नहीं चाहिए, उन्हें बहू भी मत दीजिये।