04/05/08

शिकायत ओर गिलो शिकवो से दुर..

आईये आप को एक ऎसी दुनिया मे ले चले, जहां किसी कॊ किसी से कोई गिला, शिकबा, ओर कोई शिकायत ना, ना कोई गेर हो, ना कोइ दुशमन हो बस सब अपने ही अपने हो... तो करे अपनी फ़लाईट की यह उडान शुरु.. तो चलिये.

यह गीत हम ने फ़िल्म दुर गगन की छावं से लिया हे,जो बनी थी १९६४ मे ओर फ़िल्म के बोल हे.. आ ले के तुझे...रचना कार शेलेंद्र हे, ओर गीत कार किशोर कुमार जी

5 comments:

  1. राज जी
    बहुत प्यारा गीत है। सच में संगीत में वो शक्ति है जो हमें एक अलौकिक दुनिया में ले जाती है। एज मधुर गीत सुनवाने के लिए बधाई।ansal

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  2. वाह ! मज़ा आ गया. बहुत दिनों बाद सुना ये गीत. शुक्रिया.

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  3. यहाँ लिखने के लिए सप्रथम आपसे माफ़ी चाहूँगा, बस मुझको लिखना था सो लिख दिया, प्रयास किया आपकी इ-मेल आईडी मिल जाए, पर न मिली तो दुविधा रही, कि कैसे अपने जेहानो-दिल की बात आप तक पहुन्च्गा, अंततः; यहाँ गुस्ताखी कर रहा हूँ, आशा है...आशीर्वाद मिलेगा.
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    ब्लोग भ्रमण करते वक़्त यूँ ही किन्ही लिखिका के इक़ आलेख पर तिप्पदियाँ पढ़ रहा था, सबके कमेंट्स लेखक के पक्ष में थे...मैं इक़ तरफ खुश था, वजह मात्र यही रही कि इक़ उभरते हुए लेखक कोई सराहा ज़रा है...वो भी हिंदी के लेखक कोई, जो गर अपने लहू से भी लिखे तो खुद्के साथ बेमानी है...मगर अन्दर बेठा इंसान न जाने किन दुविधायों के जाल में खुद मकडी बन गया है और क्यों वो इस जहाँ कोई किसे दूजे जहाँ में तब्दीली के लिए कभी कलाम घिस रहा है तो कभी भुन्खा भी सो रहा है, इक़ बेचैन आत्मा पवित्र आत्मा के अन्दर समाई हुई है...क्रांति लेखक का फसाद है...मगर फिर भी...उसने क्या किया? ये सवाल मौजूं है, अक्सर मेरे अन्दर भी उन्हीं लोगों की बाबत जादा सवाल पैदा हो जाते हैं, जो ९० प्रतिशत चीजों से शंतुस्त नहीं हैं...इस बात का मुद्दा कभी कलाम से तो कभी नारों से तो कभी इशारों से तो कभी धरनों से आम होता ही रहता है...खैर, ये मुद्दा भी बढता ही चला जायेगा, और मुझे उस "गालिब" की याद आएगी, जिसके लाखों दीवानें हैं तो बहुतों के अन्दर उनके लिए भी सवाल हैं...इक़ गैर जिम्मेदार व्यक्ति की शाख होना...! सवाल तो सवाल है,यहाँ तो जवाब भी सवाल लगते हैं...या खुदा, क्या पेचो-ख़म है और क्या माजरा, कि सब सहज है-सरल है...फिर भी कुछ नहीं-कुछ नहीं...चारों तरफ अशांति-बस हर कोई अपने मन कि भड़ास निकल कर खुद कोई शांति दे रहा है...वाह! मैं अपने भी मन की अशांति को यहीं विराम देते huye आपसे जुड़ने की गुस्ताखी की बाबत जो कहना छह रहा हूँ; पेश है: आपने जिस तरह से इक़ हौसले (हौसले क्रांति / बदलाव की पहली शर्त होते हैं, येसा मैं मानता हूँ,) को न सराहके आपने खुद उसके वजूद को ही सवालों के कटघरे में खडा किया, ये बात बेचैनी देनी के लिए काफी रही, मगर मुझे सुकून मिला...ये जायज़ सवाल था...आपकी टिप्पदी पोस्ट इस तरह है (ये फ़कत याद की रौशनी को हवा देने के लिए); {अरे अब हम कया कहे, जो बात हम ने कहनी थी,वही बात संजय जी ओर दिनेश जी ने कह दी,जेसे कुछ दिन पहले कही पढा था दिल्ली के किसी इलाके मे रिकक्षा चलने बन्द होगें, मे भी नही चाहता आदमी आदमी को खींचे, लेकिन इछ आगे भी सोचो उन लोगो का कया होगा जो रिकक्षा चला कर परिवार का पेट भरते हे,कया सरकार ने उन का रिकक्षा छीन कर उन्हे न्या काम दिया ?
    }. अब इसके बाद मैं कुछ कहना चाहूंगा तो कह भी नहीं पाउँगा, आपके विचारों से पूरी तरह सहमती है मेरी...फिलहाल इक़ निवेदन भेज रहा हूँ, मुझे अपनी लिस्ट में स्थान देकर अपने आगामीं विचारों से लगातार रु-ब-रु होने का तोहफा den...मुझे अत्यंत ख़ुशी होगी.

    "विचारों और वाक्याशों का हुजूम मेरे अन्दर आपके प्रति निकल पडा है...मगर जैसे गन्ने के खेत में भी हूँ...जोकि खेत भी पराया है, मालिक के कदमों की आहात कानों में डर पैदा कर चुकी है, मैं उसका नुकसान पूरा कर सकूं, ये कुब्बत फिलहाल तो नहीं...इसलिए मुझे भागना पडेगा...
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    मगर मैं जल्द ही कई बार लौटूंगा, आपके सन्देश को पढने के लिए...और आपकी कृपा रही तो हमेशा के लिए...
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    अलविदा
    सादर;
    अमित के. सागर
    ocean4love@gmail.com
    ocean_aksagar@yahoo.com

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  4. बहुतगीत है ऐसे कहीं सुना था की किशोर कुमार ने ये गीत अपने बेटे अमित कुमार के लिए गाया और जगह उनका थान खंडवा. धन्यवाद.

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नमस्कार, आप सब का स्वागत है। एक सूचना आप सब के लिये जिस पोस्ट पर आप टिपण्णी दे रहे हैं, अगर यह पोस्ट चार दिन से ज्यादा पुरानी है तो मॉडरेशन चालू हे, और इसे जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा। नयी पोस्ट पर कोई मॉडरेशन नही है। आप का धन्यवाद, टिपण्णी देने के लिये****हुरा हुरा.... आज कल माडरेशन नही हे******

मुझे शिकायत है !!!

मुझे शिकायत है !!!
उन्होंने ईश्वर से डरना छोड़ दिया है , जो भ्रूण हत्या के दोषी हैं। जिन्हें कन्या नहीं चाहिए, उन्हें बहू भी मत दीजिये।