Showing posts with label चर्चा. Show all posts
Showing posts with label चर्चा. Show all posts

10/18/09

हम ने दिपावली कुछ इस तरह मनाई... ओर आप ने केसे मनाई



नमस्कार भाई हम ने यहां घर मै अपने छोटे से मंदिर मै पूजा की, बच्चो को पता चले कि आज का दिन हमारे धर्म मै बहुत बडा है.फ़िर सब ने मिल कर सब से पहले गणेश जी की फ़िर लक्षमी जी की, ओर फ़िर ओम जय जगदीश आरती की, फ़िर सब ने मिल का  घर की बनी मिठाई खाई, ओर फ़िर से फ़ोन को चला दिया , फ़िर सब जानने  वालो के फ़ोन काल आते रहे, लेकिन इस साल फ़ोन काल कम आये, लेकिन बच्चो ने कोई आतिशवाजी नही करी
सब से पहले चित्र मै मिठाई भगवान के चरणो मै रखी है,फ़िर घर के सभी सदस्य मिल कर बेठ गये ओर आरती शुरु कर दी, फ़िर देखे हमारी आरती की थाली, मिट्टी के दिये ओर उन मै शुद्ध सरसॊं का तेल( यह मै भारत से लाया हुं)

ओर सब से अंत मै बच्चे ओर बीबी पूजा करते हुये, मै चित्र खींच रहा हुं, ओर मेरे साथ मेरा हेरी भी खडा है, उसे इस दिन बहुत मजा आता है, क्योकि उसे भी इस दिन मिठाई जो मिलती है... मां ओर पिता जी की बहुत याद आई, क्योकि इस दिन मां ओर पिता जी फ़ोन जरुर करते थे,ओर मां ने कहा था कि कुछ भी हो शगन जरुर करना सब त्योहरो का, जिस से हमे भी खुशी होगी,आप सुनाये आप ने केसे मनाई दिपावली

3/7/09

चर्चा..दहेज

नमस्कार, बहुत से पाठको ने पहेली बन्द ना करने की बात कही,तो मै फ़िर से यह पहेली बूझना चलाऊगा, लेकिन थोडा कम करुगां, क्योकि पहेली पुछना पहेली बताने से ज्यादा कठीन है, तो चलिये अगली पहेली मे कुछ दिनो बाद पुछुगां.





लेकिन मेने एक नया कार्य कर्म बनाया है *चर्चा* नाम से जिस मै हम अलग अलग बातो पर चर्चा किया करेगे, ओर आप सब अपनी अपनी राय उस विषय पर दे सकते है, आप सभी के विचार बहुत ही कीमती होगे, लेकिन जब भी जिस विष्य पर चर्चा हो तो आप के विचार सिर्फ़ उस चर्चा पर ही हो किसी खास व्याक्ति को निशाना बना कर या दुसरे का नाम ले कर ना हो, मेरे लिये आप सभी सम्मान जनक है, ओर सभी के विचार हिन्दी मे हो तो ज्यादा उचित होगा.
न्यवाद
आज की चर्चा है दहेज, जिस से हम सब बहुत दुखी है, बहुत से केस रोजाना अदालतो मे आते है, बहुत सी शादिया टुटती है, यानि इस दहेज से सभी को दुख है ओर वो भी सिर्फ़ देते समय, लेते समय सभी इन सब बातो को भुल जाते है, दहेज आज कल से नही बहुत ही पुरानी रीति है जिसे हमारे बुजुर्गो ने सदियो पहले बनाया था, ओर इतनी पुरानी रीति जो सदियो से चली आ रही है, उस मै एक दम से कुरितिया केसे आ गई?
यह रीति जिसे बुजुर्गो ने बनाया बिलकुल सही बनाई थी,लडकी की शादी के समय, लडकी को उस का हिस्सा ( बाप की ज्यादाद ) दहेज के रुप मे दे दिया जाता था, उस के बाद जब भी लडकी मायके मै आती तो माता पिता उस के बाद भाई उसे अपनी ओकात के हिसाब से उपहार देते, दिन त्योहार पर भी उसे उपहार भेजते थे, इस का मतलब यह था कि लडकी को याद दिलाते थे, कि हम अब भी तेरे अपने है, इस घर से अब भी तेरा नाता है, सुख दुख मै हम तेरे साथ है, ओर भाई बहिनो मे खुब प्यार होता था. ओर कोई भी लालच नही होता था,
दहेज मै लडकी का बाप अपनी हेसियत से अपनी मरजी से देता था, ओर लडके वाले भी जो मिलता था उसे सर आंखो पर रखते थे, ज्यादा की मांग कोई नही करता था, मांग होती थी तो लडकी के गुणो की, जिस ने घर को आ कर समभंलना है, बचपन से ही लडकी को सभी बाते समझाई जाती थी, ओर आज भी जिस लडकी मे शालीनता है सहन शाक्ति है, बोलने का ढंग है, बातो मै एक बेटी, एक मां का प्यार झलकता है वोही अपने घर को स्वर्ग बना पाती है, ओर असली दहेज यह गुण होते थे,


शादी के बाद हिन्दू धर्म के अनुसार( क्न्या दान) के बाद लडकी का घर उस का ससुराल होता है, ओर अपने मायके मै आना जाना तो होता है, लेकिन बहुत प्यार से, ओर भाई भी उस के बच्चे सभी इन्तजार करते थे, ओर मिलने के बहाने के लिये अलग अलग त्योहार बनाये गए थे, जेसे राखी, भाईया दुझ, ओर लडकी शादी के बाद मायके के किसी भी काम मे दखल नही देती थी, ओर ना ही भाईयो को कोर्ट कचहरी तक ले जाती थी, कोर्ट कचहरी जाना एक अपमानित माना जाता था, किसी के घर भी कभी पुलिस नही आती थी, तालाक तो शायद लाखो मे एक होता था.



मै भी ओर आप सभी भी दहेज का विरोध तो सभी करते है, ओर इसी दहेज के कारण कितने ही झुठे सच्चे केस आज कल लडकी ओर लडकी वाले बनाते है, तलाको की संख्या शायद युरोप से भी बढ कर हो गई है, लेकिन जो लडकी जब ससुराल आती है तो उस समय तो वो अपने ससुराल वालो का जीना हराम कर देती है, चलो अगर लड झगड कर वो घर मे किसी तरह से बस गई तो कुछ सालो बाद अपने मां बाप का, अपने भाईयो का जीना हराम कर देती है, उन की ज्यादाद मे से हिस्सा मांग कर, फ़िर भाईयो से ओर मां बाप से दुशमनी, यह सब मेने एक घर मै नही बहुत से घरो मे देखा है, ओर इस ब्लांग जगत मै भी नारियां बहुत गर्व से यह कहती नही अखराती की मां वाप की ज्यादाद मे हमे हिस्सा चाहिये,



अगर हिस्सा ही मांगना है तो उस से अच्छा तो पहले ही दहेज ले कर चुप हो जाओ, अब अपने पिता के छोटे से व्यापार को बेटा या बेटे मिल कर खुब बडा कर ले, एक मकान की जगह खुबसुरत बंगला खरीद ले, ओर बडो का मान रखने के लिये सब कुछ मां बाप के नाम से हो ओर एक दिन प्यारी बहन कोर्ट कचहरी की धमकी दे हिस्सा लेने के लिये, तो प्यार कहा गया, कहा गया मान, कहा गये भाई बहिन, क्या यह सब उचित है?



कानुन तो कानुन हे, लेकिन कनुन के दिल नही , भावनाये नही, रिशते नाते नही, आज गुण पेसा है, प्यार पेसा है, भाई बहिन सब पेसा है? तो आओ हम इस दहेज के साथ ही अपना हक भी ना मांगे, जिस से हमारे रिश्तो मे एक मिठास बनी रहे, आओ दुरिया घटाये, दुरिया बढाने से कोई लाभ नही.

आप सब की राय का इन्तजार रहेगा, अच्छी , बुरी, सहमत असहमत जेसी भी हो आप अपनी राय जरुर दे, यह मेरे अपने विचार है, कोई पक्की मोहर नही, शायद मै गलत भी हो सकता हुं.
अगर आप के पास भी कोई चर्चा लायक बात हो तो आप भी इस मे हिस्सा ले सकते है, गर कोई गलती हो तो क्षमा करे,

मुझे शिकायत है !!!

मुझे शिकायत है !!!
उन्होंने ईश्वर से डरना छोड़ दिया है , जो भ्रूण हत्या के दोषी हैं। जिन्हें कन्या नहीं चाहिए, उन्हें बहू भी मत दीजिये।